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हिंदी साहित्य के विकास के प्रमुख बिन्दु

हिंदी साहित्य के विकास के प्रमुख बिन्दु

प्रिय दोस्तो हम हिंदी साहित्य के विकास के प्रमुख बिन्दुओं पर प्रकाश डालेगें जिसमें वातावरण , सन्तुलन और विभिन्न बिन्दुओं पर चर्चा करेंगे । हिन्दी साहित्य का विकास कैसे हुआ उसके इतिहास दर्शन की पूरी जानकारी दी जाएगी। हम आपके लिए इसी प्रकार की महत्वपूर्ण जानकारियाँ लाते रहेंगे।

हिंदी साहित्य के विकास के प्रमुख बिन्दु

हिंदी साहित्य के विकास के प्रमुख बिन्दु

 

हिंदी साहित्य के विकास के प्रमुख बिन्दु

 हिंदी  साहित्य के विकास के लिए हमें निम्नलिखित पाँच बिन्दुओं को स्वीकार करना आवश्यक है।

प्राकृतिक  सृजन शक्ति : – 

     साहित्य के विकास में सर्वाधिक योगदान प्राकृतिक सर्जन शक्ति का रहता है जो व्यक्ति के माध्यम से कार्य करती है। प्राचीन व अर्वाचीन साहित्य शास्त्रियों ने इस विशेष शक्ति  को प्रतिभा , सर्जन क्षमता , कल्पना शक्ति , सहानुभूति आदि नामों से पुकारा है। सभी वर्ग के चिन्तक साहित्यकार में एक विशेष शक्ति का अस्तित्व अवश्य मानते हैं।

      वस्तुतः साहित्य का सृजन का विशिष्ट शक्ति के द्वारा होता है ; जो विभिन्न मात्रा में नौसर्गिक रूप में प्राप्त होती है। साहित्यकार की सृजन क्षमता विचारों , भावों , अनुभूतियों , संस्कारों आदि का सहयोग प्राप्त करती है तथा विचार , भाव , अनुभूति आदि की क्षमता भी उसे प्रकृति से ही प्राप्त होती है। इन्हीं क्षमताओं को समन्वित रूप में मानानिक शक्ति नाम दे देते हैं।

परम्परा :-  

      साहित्य के विकास  की प्रक्रिया का दूसरा मूल तत्व परम्परा है। कोई भी साहित्यकार अपनी अपार सृजन क्षमता के होते हुए भी परम्परा से कुछ न कुछ ग्रहण किए बिना साहित्य के विकास में योगदान नहीं दे सकता।

        साहित्यकार अनेक परम्पराओं को न अपनाकर अपनी रुचि , संस्कार , परिस्थिति  इत्यादि के आधार पर किसी परम्परा को अपनाते हैं। साहित्यकार किसी भी युग अथवा देश की परम्परा को अपना सकता है। वस्तुतः हमें परम्पराओं का अध्ययन करते समय साहित्यकार की उपरोक्त सभी प्रवृत्तियों को ध्यान में रखना चाहिए।

 

साहित्य के विकास के महत्वपूर्ण बिन्दु : –
1. प्राकृतिक सृजन शक्ति
2. परम्परा
3. वातावरण
4. द्वन्द्व
5. सन्तुलन

वातावरण :-   

    विकास प्रक्रिया का तीसरा चरण वातावरण है। साहित्य की दृष्टि से वातावरण के चार पक्ष निर्धारित किए जा सकते हैं ।

1. युग विशेष की सामान्य परिस्थितियाँ

2. साहित्यकार की विशेष परिस्थितियाँ   

3. साहित्यकार के आश्रयदाताओं या पाठकों की रुचि व प्रवृत्ति

4.  विशिष्ट रचना से सम्बन्धित विशेष प्रेरणास्त्रोत

    कोई भी साहित्यकार अपने युग के वातावरण , पाठकों या आश्रयदाताओं की रुचि , प्रवृत्तियों एवं विभिन्न प्रेरणा स्रोतो से कम या अधिक मात्रा में प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। वस्तुत: इन सबका सम्मिलित प्रभाव ही साहित्यकार की सृजन शक्ति के उद्दीपन , पोषण एवं संरक्षण का कार्य करना है। वातावरण की उपेक्षा करने वाला साहित्यकार अपनी पूर्ण क्षमता विकसित करने में असफल रहता है।

और पढ़ें : – हिंदी साहित्य का इतिहास : आदिकाल

द्वन्द्व : – 

   विकास प्रक्रिया में योगदान देने वाला चौथा तत्त्व ‘ द्वन्द्व ‘ है। द्वन्द्व दो वस्तुओं के पारस्परिक आकर्षण व प्रतिकर्षण के कारण होता है। विकास के क्षेत्र में सृजन शक्ति द्वन्द्व से ही प्रेरित होकर सक्रिय होती है। साहित्यकार की भी सृजनशक्ति किसी न किसी प्रकार के द्वन्द्व से प्रेरित होकर परम्परा व वातावरण के सहयोग से कार्य करती है।

द्वन्द्व भौतिक , सामाजिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक या माननिक किसी भी प्रकार का हो सकता है। द्वन्द्व  जितना तेज होगा साहित्य के विकास की परम्परा उतनी ही तीव्र होगी।

सन्तुलन : – 

    साहित्य के विकास प्रक्रिया का पाँचवाँ तत्त्व सन्तुलन या सामंजस्य है। यह सन्तुलन द्वन्द्व की ही चरम परिणति का सूचक है। लक्ष्य की पूर्ति होने पर द्वन्द्व स्वतः समाप्त हो जाता है। इन स्थिति को सन्तुलन नाम दिया गया है ।

       इस प्रकार साहित्य की किसी भी कृति , प्रवृत्ति , धारा , परम्परा के विकास को स्पष्ट करने के लिए उपरोक्त पाँचो तत्त्वों का होना अनिवार्य है । इन्ही पाँचो तत्त्वों को ध्यान मे रखकर रचनाकार के व्यक्ति वैशिष्ट्‌ , आधारभूत , परम्परागत तत्त्वो , तद् युगीन वातावरण तथा प्रेरक द्वन्द्व  सन्तुलन की स्थितियों पर विचार करना चाहिए अन्यथा हमारे निष्कर्ष एकांगी अथवा एक पक्षीय हो सकते है ।

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प्रिय दोस्तो , आज हमारे द्वारा दी गई जानकारी आपको कैसे लगी कृपया  comment करके बताएं । आपको किसी अन्य प्रकार की जानकारी चाहिए तो हमें बताइए हम उसी प्रकार की blog post अपनी बेब साइड superrealstory.com पर लेकर आऊँगी ।

2 thoughts on “हिंदी साहित्य के विकास के प्रमुख बिन्दु”

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